Dr. Bhimrao Ambedkar 129th Birthday

आंबेडकर के पिता रामजी मालोजी सकपाल और माता भीमाबाई हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो उस समय अछूत मानी जाती थी. कबीरपंथ से जुड़ाव होते हुए भी उन्होंने अपने बच्चों को हिंदू ग्रंथों को पढ़ने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया.

आंबेडकर पढ़ने-लिखने में बहुत तेज थे,
लेकिन सिर्फ निम्न जाति का होने के कारण उनको और उनके जैसे निम्न जाति के अन्य अस्पृश्य बच्चों को स्कूल में क्लास के बाहर अलग बिठाया जाता था.
उनको क्लास के अंदर आने की परमिशन नहीं थी.
अधिकतर टीचर इन अस्पृश्य बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की ओर न तो ध्यान देते थे और न ही उनकी कोई मदद करते थे
घंटों रहना पड़ता था प्यासा
छुआछूत और भेदभाव का अमानवीय व्यवहार इतना ज्यादा था कि अस्पृश्य बच्चों को प्यास लगने प‍र स्कूल का चपरासी या कोई अन्य ऊंची जाति का व्यक्ति ऊंचाई से उनके हाथों पर पानी गिराकर उन्हें पानी पिलाता था, क्योंकि उनको न तो पानी,
न ही पानी के बर्तन को छूने की इजाजत थी.
ऊंची जाति के लोगों का ऐसा मानना था कि ऐसा करने से पानी और बर्तन अपवित्र हो जाएंगे. अस्पृश्य बच्चों को पानी पिलाने का काम स्कूल का चपरासी करता था. उसकी अनुपस्थिति में अक्सर अस्पृश्य बच्चों को बिना पानी के ही प्यासे रह जाना पड़ता था.
ऐसे दिलाया दलितों को पानी पीने का अधिकार
1920 के दशक में डॉ. आंबेडकर लंदन से बैरिस्टर बनकर वापस लौटे थे.
वह 1926 में बम्बई विधान परिषद के सदस्य भी बने थे.
इस समय तक उन्होंने सामाजिक कार्यों और राजनीति में सक्रिय भागीदारी शुरू कर दी थी.


हिंदू धर्म के आदर्शवादी और आध्यात्मिक विचारों से आंबेडकर बहुत प्रभावित थे,
लेकिन वह जब सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते थे,
तो अपनी जाति के लिए सामाजिक प्रतिरोध और छुआछूत का व्यवहार देख बहुत दुखी हो उठते थे.

बाबा साहेब ने अपने समाज को बताया कि सार्वजनिक स्थान से पानी पीने का अधिकार एक मूलभूत अधिकार है. .
1923 में बम्बई विधान परिषद ने एक प्रस्ताव पास किया कि सरकार द्वारा बनाए गए और पोषित तालाबों से अछूतों को भी पानी पीने की इजाजत है.
1924 में महाड़ नगर परिषद ने इसे लागू करने के लिए एक प्रस्ताव भी पास किया. .
फिर भी अछूतों को स्थानीय सवर्ण हिंदुओं के विरोध के कारण पानी पीने की इजाजत नहीं थी.
बाबा साहेब का उद्देश्य दलितों में उनके मानव अधिकारों के लिए जारूकता पैदा करना था. .
उन्होंने यह निश्चय किया कि हमारा अछूत समाज इस तालाब से पानी पीकर रहेगा.
दलितों को दिया साफ-सफाई का संदेश
इसके लिए दो महीने पहले एक सम्मेलन बुलाया गया. लोगों को गांव-गांव भेजा गया कि 20 मार्च, 1927 को हम इस तालाब से पानी पिएंगे.
सम्मेलन में बाबा साहेब आंबेडकर ने अछूतों की भीड़ के सामने ओजस्वी भाषण दिया कि हमें गंदा नहीं रहना है, साफ कपड़े पहनने हैं, मरे हुए जानवर का मांस नहीं खाना है.
हम भी इंसान हैं और दूसरे इंसानों की तरह हमें भी सम्मान के साथ रहने का अधिकार है.
उस वक्त महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में महाड़ कस्बे के चावदार तालाब में सिर्फ सवर्णों को ही नहाने और पानी पीने का हक था …
आंबेडकर ने कहा कि इस तालाब का पानी पीकर हम अमर नहीं हो जाएंगे,
लेकिन पानी पीकर हम दिखाएंगे कि हमें भी इस पानी को पीने का अधिकार है.
जब कोई बाहरी इंसान या जानवर भी इस तालाब का पी सकता है, तो हम पर रोक क्यों?
बाबा साहब ने इस आंदोलन की तुलना फ्रांसीसी क्रांति से की. भाषण के बाद डॉ. आंबेडकर हज़ारों अनुयायियों के साथ चावदार तालाब गए, और वहां पानी पिया.

आंबेडकर मार्टिन लूथर किंग से बेहद प्रभावित थे.
लूथर ने अमेरिका में ऐसा ही आंदोलन किया था.
उनका कहना था कि काले लोगों को सभी सड़कों पर चलने का हक होना चाहिए.
उन्हें सभी बसों में सफर का, किसी भी रेस्टारेंट में जाने का और सभी पब्लिक स्कूलों में पढ़ने का भी हक होना चाहिए…

॥ शत शत नमन ॥

Government of India launches AarogyaSetu mobile app to track spread of Covid-19 (CoronaVirus)

The ministry of electronics and  Information Technology  launched a mobile app on Thursday called “AarogyaSetu”  in 11 languages  supports  both Andriod and ioS which will help people in identifying the risk of getting affected by the CoronaVirus.

This app is built through public private partnership to “assesses people risk for their catching the Corona Virus infection. Also It calculate this based on their interaction with others, using cutting edge Bluetooth technology, algorithms and artificial intelligence,” an official statement said.

Download and help the government to fight against corona.

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