विकास के दूर होता गरीब

हमारा देश भारत वर्ष को आज़ाद हुए तो ६५ वर्ष हो रहे है, इसे सुखद दुर्भाग्य ही कहेंगे कि हमारे बुजुर्ग जिन्होंने आज़ादी के नाम पर अपनी जिदगी कि बाजी लगा दी और जालिम अंग्रेजो और मौका परस्तो के छलावे के बाबजूद भी हमें खुली हवा में साँस के लिए आज़ाद कर गए और हम लोग उसी आबो हवा को अपने कुकर्मो लालच, फरेब, धोखा, गद्दारी, लूट, चापलूसी इत्यादि से प्रदूषित किये बैठे है;व्यस्क उम्र के हिसाब से देखे तो ये हमारी आज़ादी कि तीसरी पीढ़ी है और चौथी पीढ़ी आज़ादी का चौथा मनाने के लिए उतावली बैठी हैं ।

देश कि तीसरी पीढ़ी ने जितना देश को लुटा और नुकशान पहुचाया है शायद ही अंग्रेजो ने भी भारत को लूटने के लिए इतनी ततपरता दिखाई होगी । खास बात तो ये अंग्रेजो ने तो शायद ही कभी सोचा होगा कि भारत आज़ाद होगा और वह इंग्लैंड वापस जायेंगे । विकास का नारा लगाने वाले हमारे नेता माननीय तो बन गए लेकिन अंग्रेजो के इतिहास से लूट खसोट और तिजोरी भरना तो सिख गए लेकिन विकास के लिए नारे लगाने के सिवा कुछ नहीं किया ।

गोरे अंग्रेजो का भला हो जिन्होंने हमें विकास के उस राह पर तो छोड़ा कि रेल कि पटरिया, सड़के, इत्यादि को हमारे नेता लोग शर्म शर्म में बनाते तो है । आज देश के विकास कि समीक्षा कि जाये तो हम अंग्रेजो से भारतीय विकास कि श्रेणी में १०% भी योगदान नहीं दे पाये । ये दिगर बात है कि कई समाचार पत्रो ने ये जरूर कहा कि भारत को अंग्रेजो से कई गुना भारतीयो ने ही लूटा ।

जनता कि धीमी आहे अब चीत्कार में बदल रही है, नतीजा साफ दिख रहा है तीसरी पीढ़ी के बूढ़े होते चौथी पीढ़ी के जवानो कि बौखलाहट से घबराये हुए मुहं छिपाये सिद्धांतिक बाते कर अपना पद और कद दोनों बचाते हुए छुपते दिखने लगे हैं । आवाम कि नवज कि समिक्षा करने वाले इसको काले अंग्रेजो कि जंग भी कहने से गुरेज नहीं कर रहे है ।

सच ही तो है अर्थ व्यस्था में धन पानी कि तरह ही होता है, जैसे पानी एक जगह रुक जाये तो गन्दा हो कर काला पड जाता है वैसे ही आज कला धन हो गया है ।

अन्ना हज़ारे, स्वामी रामदेव, सुब्रमणियम स्वामी जैसे देश भक्त लोगो में युवा कल के क्रन्तिकारी और नायक देख रहे है इनमे आज़ादी के नायक सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्र सेखर आज़ाद, भगत सिंह , सुखदेव, राजगुरु इत्यादि के पुनर जन्म लिए आत्म जाग्रति होने लगी हैं । देश भी पुकार रहा है कि सिर्फ गांधी व् विवेकानंद के आदर्शो कि बाते करने से देश नहीं चलेगा, ऊँची आवाज में एक स्वर से उठ रहा हर घर, गली चौराहे से आवाजे सत्ता को जड़े हिलाने को बेताब है ।

पेट से सुलगती आग ने जाति, आरक्षण, विकास के नारे और झूठे वादो को किनारे कर दिया है । देश को आर्थिक गुलामी कि ओऱ धकेलने वाले चंद अर्थशास्त्री अब देश के अर्थ शास्त्र में फेल हो चुके है, सिर्फ नाम कि फर्जी डिग्री और कुछ मेडल लेने के अलावा इनके पास देश को कुछ देने के लिए है भी नहीं। लोक लुभावन बाते तो खेत में किसान भी करता है जब फसल चढ़ती है और घरवाली पास में होती है तो तरह तरह से प्रलोभन देकर उसका मान करता हैं, उसकी आँखों में ख़ुशी कि चमक विखेर देता हैं और सच ये कि दोनों ये जानते हुए कि ये झूठ ही तो है ।

विकास कि राह पकडे चलते हुए कब लोगो ने अंपने विकास कि बात कर ली और देश कि जनता का हक मारने लगे, भोली-भली, और अंध-भक्त जनता को पता ही नहीं चला ।

बहुत ही आधुनिकी शैली के कुछ प्रखर पढ़े लिखे नेता अनुभव कि बाते करते हैं और खुद के घर में मच्छरो से लड़ने के लिए परदे लगा लेते हैं और मान लेते हैं कि सब ठीक है सबके घर में ये सुबिधा हो गयी।

सरकारी और राजनीती तंत्र में सुरक्षित वंशवाद के खिलाफ पुरजोर वकालत करने वाले लोगो के जब अपनों पर आती है तो सारे सिद्धांत को ताक पर रखने से तनिक गुरेज नहीं करते ।

सच ये है कि गरीब कि ईमानदारी, उसकी ख़ुशीयों, उसकी इज्जत, उसकी प्रगति, उसके मेहनत कि कमाई, और उसकी सुबिधायो और उसके मूल्यो कि जब जब बात होती है, तो सब उसमे हिस्सा लगा के ठीक उसी तरह बाट लेते है जैसे खलिहान में रखे आनाज के ढेर को खुले में अगर रख दे, तो सभी पशु और पक्षी उसमे मुहं मार के अपना मुहं भर लेते है फिर गरीब को हिस्से मिलती हैं कुछ बिखरे हुए दाने जो ताउम्र अपनी नंगी पीट को सेकते हुए बटोरता हुआ काल का गाल बन जाता है ।

किसको पड़ी है ये सोचने कि उसका क्या हुआ? सत्ता के गलियारो में बिल्ली और बंदर के खेल में बिल्ली बने रहना ही अच्छा हैं, और इसी का नाम विकास भी हैं, देश का क्या, कोई और कर देगा, हम भगवान थोड़े ही है।

ये लेख मैंने आँखों में आंशु लिए इस नन्हे फ़रिश्ते के लिए लिखा है, जो कीचड़ में नंगे पाव झंडे को लिए दौड़ रहा है । (चित्र संलग्न हैं)

मैं भी भूल जाउंगा इसे अपने अंशु पोछ कर कि सब ठीक है, कोई और सोच लेगा इनके बारे में । मुझे क्या मैं तो अपने लाइक, साझा और अच्छे कमेंट का भूखा हूँ ।

दिनाकं :१८-०२-२०१४

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