गाँवो  से दूर है भारत सरकार का विकास

“भारत गाँवो का देश था“ अब ये कहना बिलकुल भी गलत नहीं होगी जैसे हम कहते हैं कि “भारत देश सोने कि चिड़िया था”।

भारत देश के गाँव से दूर है विकास, जिधर जाइये आपको टूटे हुये नाले, पुलिया, उखड़ी हुई सड़के, बेहाल स्कूल, पटरी से उतरी हुई व्यवस्था हर जगह विकास के नारो को मुँह चिढ़ाते हुए दिख जायेंगे।

उन गावों या मुहल्लो का और भी बुरा हाल है जहाँ पर सरकार के तरफ से कोई प्रत्यासी चुनाव नहीं जीता, वह गाँव तो पुरे ५ वर्ष उपेच्छा ही सहता रहता है। विकास का नारा लगा कर अपने गले को रुंधा देने वाले नेता आज जनता से बात करना तो दूर है अपने क्षेत्र में दिखते भी नहीं है । आज़ादी के बाद से ही गावो के ऊपर राजनीति करने वाले नेता अपने और अपने राजनैतिक स्वार्थ कि पूर्ति करने के लिए हाथ जोड़ते हुए हर ५ वर्ष में नज़र तो आते है, लेकिन उनका वायदा सड़को पर उड़ती धूल कि तरह ही होता है । जनता को कमजोर,गरीब, लाचार, वेपरवाह, मुर्ख, कमजोर दिमाग कहने से तो अब बड़े-बड़े कद्दावर नेता भी नहीं चुकते ।

गावों के विकास के लिए सरकारी और गैर सरकारी संगठनों का कोई ढाँचा किसी गाँववासी को नहीं मालूम होता या उनकी विकास में भागीदारी के लिए भी कोई राय शुमारी की जरूरत नहीं समझी जाती है । ग्राम प्रधान अपने अधीन आने वाले सभी कार्यो का आधार स्वयं के विकास पर केंद्रित कर ५ साल कार्य करता है, जैसे अगर वह उस गाँव में रहता है तो सड़के बनवाने का कार्य अपने लोगो को ठेके दे कर करा लेगा, नल और कुंए, तालाब, और जरूरी परियोजनाओ का फायेदा सांठ गाँठ करके हड़प लेगा, इन सबसे ऊपर उठ कर अपने ही घर परिवार में स्कूल खोल लेगा और उसका दोहरा फ़ायदा सरकार और गैर सरकारी सहायता से या फिर मासिक शुल्क के रूप में छात्रों से वसूल लेगा । इन्ही सब मे अगर गाँव का विकास हो गया तो हो गया, और फिर गाव की मजवूर जनता ५ वर्ष बाद आर्थिक तंगी कि शिकार या मोह में या भय में फिर वोट डाल कर इनका खुला अन्याय सहती रहती है ।

आज मैं अपने ही गाँव को देखता हूँ जहाँ से भाई चारा ख़त्म हो गया, ऐसा क्यों हुआ? बहुत सोचने के बाद मुझे जबाब मिला, कि पहले गाँव में चुनावी नेता नहीं थे प्रतिस्पर्धा नहीं थी आदर्शवादी लोग होते थे वही लोग सुबह से शाम तक गाँव कि समस्याएँ सुनते और सुलझाते थे, आज उनकी जगह नेता जी ने ले ली है, और उन्होंने क्या किया शराब कि दुकानें खुला ली, मॉडल शॉप बनवा दिए और युवाओ को जाती के नाम पर, महिलाओ को सुंदरता और ईर्ष्या के नाम पर, परिवारों को अमीरी गरीबी के नाम पर, समुदायो को अलग-अलग कौम के नाम पर लड़ा दिया और गाव को स्वर्ग से नरक कि और झोंक दिया है, दिशा विहीन समाज, दिशा विहीन नेता ना जाने किधर कि डगर पकड़ कर चले जा रहे है, गाव में आज हर आदमी नेता है, हर आदमी कि अपनी अलग डफली है, और वह उधर ही जाने को मजबूर है, जहाँ से उसके अपने स्वार्थ कि पूर्ति हो रही है ।

असल में गाँव का विकास बड़ी सड़के, बड़े नाले, पुरे समय बिजली, पक्के मकान, पक्की दुकान, बड़े स्कूल, अस्पताल, पक्की नहरे, खेती के लिए साधन, खेती के लिए बीज, अनाज भण्डारण कि जगह, नियमित सिचाई, मंडी समितियों का विकास, उन्नत बीजो का भण्डारण, डेरी फार्म, किसान का प्रशिक्षण, उसके परिवार का स्वास्थ, उनके बच्चों कि शिक्षा, उनके लिए आय के नए स्रोत, ग्रामीण बैंक का विकास, किसान ऋण, उनके भविष्य कि सुरक्षा, लड़के- लड़कियों कि शादी, उनको प्रोत्साहन हेतु उपहार, इत्यादि ज़रूरतों से ऊपर है, गाव में एक भाई से दूसरे भाई और एक जाति से दूसरी जाति, एक समुदाय से दूसरे समुदाय के बीच से अँधेरे में खो रहा उनका आपसी प्रेम और सौहार्द को बचाना ।

यहाँ राज्य सरकारों के नेताओं और ग्रामीण प्रतिनिधियों को मिलकर अपनी ज़िम्मेदारी निभाने कि जरूरत है, अपने बड़े राजनैतिक फायदे से ऊपर उठ कर सोचने कि भी जरूरत है विकास के मुद्दे को बढ़ा चढ़ा कर कहने और उसको राजनैतिक बनाए जाने से विकास कही सुबकता ही रह गया है, और उसने नफरत, ईर्ष्या, हिन्दू- मुस्लिम, सेक्युलर, समाजवाद, वंशवाद, अल्पसंख्यक, पिछड़ी जाती, अनुसूचित जाती, क्षत्रिय, ब्राह्मण, शिया-सुन्नी, सिख, ईसाई, और आमिर गरीब इत्यादि ने उसकी जगह ले ली है ।

देश में चल रही पिछले कई दशको से आवासीय परियोजनाओ के होते हुए भी आज गावों में रह रहे ग्रामीण आज भी अपना जीवन घासफुश कि झोपड़ी में ही गुजार रहे हैं, इनके पास मूल जीवन कि सुविधाये जैसे पीने का पानी , शौचालय, बच्चो के लिया उनकी दैनिक जरुरी वस्तुए, स्कूल, दवा, अस्प्ताल , सड़के, बिजली, और भी बहुत कुछ जो ये जानते भी नहीं हैं कि इस २१ वी सदी के भारत में उनको विकास के नाम पर भूला चुके हमारे नेता उनकी ओऱ सोचना तो दूर देखना तक नहीं चाहते, अमीरी में पैदा हुए नेता गरीबो के घर में सहानुभूति देने जाते तो है लेकिन फ़ोटो खिचवाने के बाद मुड़ कर भी नहीं देखते और गरीब अपने भाग्य पर उस रात कुछ ख़ुशी लिए और कुछ दर्द सहेजे वादो का दंश सह कर रह जाता है ।

भारत में गावों के लिए करोडो रूपये सरकारी खजाने से फूंक कर बड़े-बड़े दावो का पोस्टर और योजनाओ का मूल रूप से लागु करवाने वाले हमारे प्रतिनिधि अपनी झोली भर के अपनी अमीरी कि शान को इन गरीबो के सपनो को रौंद कर दूर कर लेते है

लेख अभी जारी है …

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