कविता : बुझते दीये की रौशनी

कविता पाठ -11 शीर्षक : बुझते दीये की रौशनी

बुझते दीये की, वो आखिरी लौ, देखी होगी ।

गर्व का धुँआ छोड़ती, वो आखिरी लौ, देखी होगी ।

अँधेरे से जूझती, उसकी आखिरी किरण, देखी होगी ।

दीये की बाती से, छोटी होती ज़िंदगी, देखी होगी ।

दीये में घटते तेल से, कम होती जिन्दगी, देखी होगी ।

शिकवा नहीं अब, टूटती हुई जिन्दगी की साँसो से ।

मडराते पतिंगो की, जिन्दगी भी मैंने ही ली होगी ।

जूझ रहा हूँ, अपने ही अँधेरे मन में।

कोई तो रौशनी, कर दे मेरे तरल मन में ।

कचोटती, तडपती हूँई, फन्ना होती जिन्दगी

सयाह रही, ताउम्र, रौशनी की खातिर ।

शपथ ये, कि, फिर बनूँगा लौ इसी जमीं

जंगी रहूँगा,ता उम्र, अँधेरे की खातिर ।

कभी तो छलकुंगा, दीये से, “लोकनायक”

पल भर ही सही, वेखौफ़, जलूँगा, जिन्दगी की खातिर।

सोचता हूँ, अंधरे को धुंए से भी हरा दूँ ।

जलते-जलते, अँधेरे को लौ बना दूँ ।।

— राजीव यादव “लोकनायक” 17-02-2014

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