Dr. Bhimrao Ambedkar 129th Birthday

आंबेडकर के पिता रामजी मालोजी सकपाल और माता भीमाबाई हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो उस समय अछूत मानी जाती थी. कबीरपंथ से जुड़ाव होते हुए भी उन्होंने अपने बच्चों को हिंदू ग्रंथों को पढ़ने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया.

आंबेडकर पढ़ने-लिखने में बहुत तेज थे,
लेकिन सिर्फ निम्न जाति का होने के कारण उनको और उनके जैसे निम्न जाति के अन्य अस्पृश्य बच्चों को स्कूल में क्लास के बाहर अलग बिठाया जाता था.
उनको क्लास के अंदर आने की परमिशन नहीं थी.
अधिकतर टीचर इन अस्पृश्य बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की ओर न तो ध्यान देते थे और न ही उनकी कोई मदद करते थे
घंटों रहना पड़ता था प्यासा
छुआछूत और भेदभाव का अमानवीय व्यवहार इतना ज्यादा था कि अस्पृश्य बच्चों को प्यास लगने प‍र स्कूल का चपरासी या कोई अन्य ऊंची जाति का व्यक्ति ऊंचाई से उनके हाथों पर पानी गिराकर उन्हें पानी पिलाता था, क्योंकि उनको न तो पानी,
न ही पानी के बर्तन को छूने की इजाजत थी.
ऊंची जाति के लोगों का ऐसा मानना था कि ऐसा करने से पानी और बर्तन अपवित्र हो जाएंगे. अस्पृश्य बच्चों को पानी पिलाने का काम स्कूल का चपरासी करता था. उसकी अनुपस्थिति में अक्सर अस्पृश्य बच्चों को बिना पानी के ही प्यासे रह जाना पड़ता था.
ऐसे दिलाया दलितों को पानी पीने का अधिकार
1920 के दशक में डॉ. आंबेडकर लंदन से बैरिस्टर बनकर वापस लौटे थे.
वह 1926 में बम्बई विधान परिषद के सदस्य भी बने थे.
इस समय तक उन्होंने सामाजिक कार्यों और राजनीति में सक्रिय भागीदारी शुरू कर दी थी.


हिंदू धर्म के आदर्शवादी और आध्यात्मिक विचारों से आंबेडकर बहुत प्रभावित थे,
लेकिन वह जब सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते थे,
तो अपनी जाति के लिए सामाजिक प्रतिरोध और छुआछूत का व्यवहार देख बहुत दुखी हो उठते थे.

बाबा साहेब ने अपने समाज को बताया कि सार्वजनिक स्थान से पानी पीने का अधिकार एक मूलभूत अधिकार है. .
1923 में बम्बई विधान परिषद ने एक प्रस्ताव पास किया कि सरकार द्वारा बनाए गए और पोषित तालाबों से अछूतों को भी पानी पीने की इजाजत है.
1924 में महाड़ नगर परिषद ने इसे लागू करने के लिए एक प्रस्ताव भी पास किया. .
फिर भी अछूतों को स्थानीय सवर्ण हिंदुओं के विरोध के कारण पानी पीने की इजाजत नहीं थी.
बाबा साहेब का उद्देश्य दलितों में उनके मानव अधिकारों के लिए जारूकता पैदा करना था. .
उन्होंने यह निश्चय किया कि हमारा अछूत समाज इस तालाब से पानी पीकर रहेगा.
दलितों को दिया साफ-सफाई का संदेश
इसके लिए दो महीने पहले एक सम्मेलन बुलाया गया. लोगों को गांव-गांव भेजा गया कि 20 मार्च, 1927 को हम इस तालाब से पानी पिएंगे.
सम्मेलन में बाबा साहेब आंबेडकर ने अछूतों की भीड़ के सामने ओजस्वी भाषण दिया कि हमें गंदा नहीं रहना है, साफ कपड़े पहनने हैं, मरे हुए जानवर का मांस नहीं खाना है.
हम भी इंसान हैं और दूसरे इंसानों की तरह हमें भी सम्मान के साथ रहने का अधिकार है.
उस वक्त महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में महाड़ कस्बे के चावदार तालाब में सिर्फ सवर्णों को ही नहाने और पानी पीने का हक था …
आंबेडकर ने कहा कि इस तालाब का पानी पीकर हम अमर नहीं हो जाएंगे,
लेकिन पानी पीकर हम दिखाएंगे कि हमें भी इस पानी को पीने का अधिकार है.
जब कोई बाहरी इंसान या जानवर भी इस तालाब का पी सकता है, तो हम पर रोक क्यों?
बाबा साहब ने इस आंदोलन की तुलना फ्रांसीसी क्रांति से की. भाषण के बाद डॉ. आंबेडकर हज़ारों अनुयायियों के साथ चावदार तालाब गए, और वहां पानी पिया.

आंबेडकर मार्टिन लूथर किंग से बेहद प्रभावित थे.
लूथर ने अमेरिका में ऐसा ही आंदोलन किया था.
उनका कहना था कि काले लोगों को सभी सड़कों पर चलने का हक होना चाहिए.
उन्हें सभी बसों में सफर का, किसी भी रेस्टारेंट में जाने का और सभी पब्लिक स्कूलों में पढ़ने का भी हक होना चाहिए…

॥ शत शत नमन ॥

Government of India launches AarogyaSetu mobile app to track spread of Covid-19 (CoronaVirus)

The ministry of electronics and  Information Technology  launched a mobile app on Thursday called “AarogyaSetu”  in 11 languages  supports  both Andriod and ioS which will help people in identifying the risk of getting affected by the CoronaVirus.

This app is built through public private partnership to “assesses people risk for their catching the Corona Virus infection. Also It calculate this based on their interaction with others, using cutting edge Bluetooth technology, algorithms and artificial intelligence,” an official statement said.

Download and help the government to fight against corona.

Readers Corner in Covid-19 Days

Read Online

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Suraj Ka Satvan Ghoda

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Shri Bhagwat Geeta

THE ANNIHILATION OF CASTE

Gulam Giri

Source: Social Media and Internet.

Read and get knowledge as per educational purpose only.

What are electoral bonds?

On January 2, 2018, the government had notified the Electoral Bond Scheme 2018. It was touted as an alternative to cash donations and to ensure transparency in political funding.

As per the provisions of the scheme, electoral bonds may be purchased by an Indian citizen or a company incorporated or established in India.

Only political parties registered under Section 29A of the Representation of the Peoples Act, 1951 and has secured no less than one per cent votes in the last Lok Sabha elections are eligible to receive electoral bonds.

The electoral accounts are issued by the State Bank of India (SBI). The electoral bonds can be purchased in the months of January, April, July and October.

Political parties are allotted a verified account by the Election Commission and all the electoral bond transactions are done through this account only.

The donors can buy these electoral bonds and transfer them into the accounts of the political parties as a donation. The electoral bonds are available in denominations from Rs 1,000 to Rs 1 crore.

The bonds remain valid for 15 days and can be encashed by an eligible political party only through a bank account with the authorised bank within that period only.

Every donor has to provide his/her KYC detail to the banks to purchase the electoral bonds. The names of the donors are kept confidential.

Before 2017, the electoral bonds scheme was for donation of over Rs 20,000. In 2017, the government capped the donation limit at Rs 2,000.

The Communist Party of India (Marxist) and the NGO Association for Democratic Reforms (ADR) had moved the Supreme Court against the electoral bonds. The argument was that ordinary citizens will not be able to know who is donating how much to which political party.

While the government argued that the privacy in electoral bonds ensures the donors privacy and also his right to vote in secret ballot, the CPI (M) had claimed that the non-disclosure of the names of the donors would add to the woes of the Indian democracy.

On April 5, Arun Jaitley, the Union finance minister, defended the electoral bonds and said they are aimed at checking the use of black money for funding elections, as was sought to be achieved through electoral trusts proposed during the UPA-II regime.

He said in the absence of electoral bonds, donors will have no option but to donate by cash after siphoning off money from their businesses.

On Friday, the Supreme Court refused the Centre’s submission that it should not interfere with the scheme at this stage and examine whether it has worked or not only after the ongoing general elections.

The top court said it would examine in detail the changes made in laws — income Tax, electoral and banking — to bring them in consonance with the electoral bond scheme and ensure the balance does not tilt in favour of any political party.

Best impression when they mix digital and print: Google Research

A recent study by Google and Kantar suggests that digital may bring in more bang for the buck, but without print, brands may end up making a weak impression. For brands looking at the wide variety of options in terms of media channels and opportunities in terms of the tools on offer, the big question being asked is whether one ought to wade deeper into the digital pool, or float between the two big advertising channels, and print.

Happy new year 2020

God bless you all.

राघवयादवीयम

एक ग्रंथ ऐसा भी है हमारे सनातन धर्म मे।

इसे तो सात आश्चर्यों में से पहला आश्चर्य माना जाना चाहिए —

यह है दक्षिण भारत का एक ग्रन्थ

क्या ऐसा संभव है कि जब आप किताब को सीधा पढ़े तो राम कथा के रूप में पढ़ी जाती है और जब उसी किताब में लिखे शब्दों को उल्टा करके पढ़े
तो कृष्ण कथा के रूप में होती है ।

जी हां, कांचीपुरम के 17वीं शदी के कवि वेंकटाध्वरि रचित ग्रन्थ “राघवयादवीयम्” ऐसा ही एक अद्भुत ग्रन्थ है।

इस ग्रन्थ को
‘अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। पूरे ग्रन्थ में केवल 30 श्लोक हैं। इन श्लोकों को सीधे-सीधे
पढ़ते जाएँ, तो रामकथा बनती है और
विपरीत (उल्टा) क्रम में पढ़ने पर कृष्णकथा। इस प्रकार हैं तो केवल 30 श्लोक, लेकिन कृष्णकथा (उल्टे यानी विलोम)के भी 30 श्लोक जोड़ लिए जाएँ तो बनते हैं 60 श्लोक।

पुस्तक के नाम से भी यह प्रदर्शित होता है, राघव (राम) + यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है ~ “राघवयादवीयम।”

उदाहरण के तौर पर पुस्तक का पहला श्लोक हैः

वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

अर्थातः
मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं, जो
जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंने अपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे।

अब इस श्लोक का विलोमम्: इस प्रकार है

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

अर्थातः
मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के
चरणों में प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ
विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है।

” राघवयादवीयम” के ये 60 संस्कृत श्लोक इस प्रकार हैं:-

राघवयादवीयम् रामस्तोत्राणि
वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः ।
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ॥ १॥

विलोमम्:
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः ।
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम् ॥ १॥

साकेताख्या ज्यायामासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा ।
पूराजीतादेवाद्याविश्वासाग्र्यासावाशारावा ॥ २॥

विलोमम्:
वाराशावासाग्र्या साश्वाविद्यावादेताजीरापूः ।
राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ॥ २॥

कामभारस्स्थलसारश्रीसौधासौघनवापिका ।
सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभूः ॥ ३॥

विलोमम्:
भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा ।
कापिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ॥ ३॥

रामधामसमानेनमागोरोधनमासताम् ।
नामहामक्षररसं ताराभास्तु न वेद या ॥ ४॥

विलोमम्:
यादवेनस्तुभारातासंररक्षमहामनाः ।
तां समानधरोगोमाननेमासमधामराः ॥ ४॥

यन् गाधेयो योगी रागी वैताने सौम्ये सौख्येसौ ।
तं ख्यातं शीतं स्फीतं भीमानामाश्रीहाता त्रातम् ॥ ५॥

विलोमम्:
तं त्राताहाश्रीमानामाभीतं स्फीत्तं शीतं ख्यातं ।
सौख्ये सौम्येसौ नेता वै गीरागीयो योधेगायन् ॥ ५॥

मारमं सुकुमाराभं रसाजापनृताश्रितं ।
काविरामदलापागोसमावामतरानते ॥ ६॥

विलोमम्:
तेन रातमवामास गोपालादमराविका ।
तं श्रितानृपजासारंभ रामाकुसुमं रमा ॥ ६॥

रामनामा सदा खेदभावे दया-वानतापीनतेजारिपावनते ।
कादिमोदासहातास्वभासारसा-मेसुगोरेणुकागात्रजे भूरुमे ॥ ७॥

विलोमम्:
मेरुभूजेत्रगाकाणुरेगोसुमे-सारसा भास्वताहासदामोदिका ।
तेन वा पारिजातेन पीता नवायादवे भादखेदासमानामरा ॥ ७॥

सारसासमधाताक्षिभूम्नाधामसु सीतया ।
साध्वसाविहरेमेक्षेम्यरमासुरसारहा ॥ ८॥

विलोमम्:
हारसारसुमारम्यक्षेमेरेहविसाध्वसा ।
यातसीसुमधाम्नाभूक्षिताधामससारसा ॥ ८॥

सागसाभरतायेभमाभातामन्युमत्तया ।
सात्रमध्यमयातापेपोतायाधिगतारसा ॥ ९॥

विलोमम्:
सारतागधियातापोपेतायामध्यमत्रसा ।
यात्तमन्युमताभामा भयेतारभसागसा ॥ ९॥

तानवादपकोमाभारामेकाननदाससा ।
यालतावृद्धसेवाकाकैकेयीमहदाहह ॥ १०॥

विलोमम्:
हहदाहमयीकेकैकावासेद्ध्वृतालया ।
सासदाननकामेराभामाकोपदवानता ॥ १०॥

वरमानदसत्यासह्रीतपित्रादरादहो ।
भास्वरस्थिरधीरोपहारोरावनगाम्यसौ ॥ ११॥

विलोमम्:
सौम्यगानवरारोहापरोधीरस्स्थिरस्वभाः ।
होदरादत्रापितह्रीसत्यासदनमारवा ॥ ११॥

यानयानघधीतादा रसायास्तनयादवे ।
सागताहिवियाताह्रीसतापानकिलोनभा ॥ १२॥

विलोमम्:
भानलोकिनपातासह्रीतायाविहितागसा ।
वेदयानस्तयासारदाताधीघनयानया ॥ १२॥

रागिराधुतिगर्वादारदाहोमहसाहह ।
यानगातभरद्वाजमायासीदमगाहिनः ॥ १३॥

विलोमम्:
नोहिगामदसीयामाजद्वारभतगानया ।
हह साहमहोदारदार्वागतिधुरागिरा ॥ १३॥

यातुराजिदभाभारं द्यां वमारुतगन्धगम् ।
सोगमारपदं यक्षतुंगाभोनघयात्रया ॥ १४॥

विलोमम्:
यात्रयाघनभोगातुं क्षयदं परमागसः ।
गन्धगंतरुमावद्यं रंभाभादजिरा तु या ॥ १४॥

दण्डकां प्रदमोराजाल्याहतामयकारिहा ।
ससमानवतानेनोभोग्याभोनतदासन ॥ १५॥

विलोमम्:
नसदातनभोग्याभो नोनेतावनमास सः ।
हारिकायमताहल्याजारामोदप्रकाण्डदम् ॥ १५॥

सोरमारदनज्ञानोवेदेराकण्ठकुंभजम् ।
तं द्रुसारपटोनागानानादोषविराधहा ॥ १६॥

विलोमम्:
हाधराविषदोनानागानाटोपरसाद्रुतम् ।
जम्भकुण्ठकरादेवेनोज्ञानदरमारसः ॥ १६॥

सागमाकरपाताहाकंकेनावनतोहिसः ।
न समानर्दमारामालंकाराजस्वसा रतम् ॥ १७ विलोमम्:
तं रसास्वजराकालंमारामार्दनमासन ।
सहितोनवनाकेकं हातापारकमागसा ॥ १७॥

तां स गोरमदोश्रीदो विग्रामसदरोतत ।
वैरमासपलाहारा विनासा रविवंशके ॥ १८॥

विलोमम्:
केशवं विरसानाविराहालापसमारवैः ।
ततरोदसमग्राविदोश्रीदोमरगोसताम् ॥ १८॥

गोद्युगोमस्वमायोभूदश्रीगखरसेनया ।
सहसाहवधारोविकलोराजदरातिहा ॥ १९॥

विलोमम्:
हातिरादजरालोकविरोधावहसाहस ।
यानसेरखगश्रीद भूयोमास्वमगोद्युगः ॥ १९॥

हतपापचयेहेयो लंकेशोयमसारधीः ।
राजिराविरतेरापोहाहाहंग्रहमारघः ॥ २०॥

विलोमम्:
घोरमाहग्रहंहाहापोरातेरविराजिराः ।
धीरसामयशोकेलं यो हेये च पपात ह ॥ २०॥

ताटकेयलवादेनोहारीहारिगिरासमः ।

हासहायजनासीतानाप्तेनादमनाभुवि ॥ २१॥

विलोमम्:
विभुनामदनाप्तेनातासीनाजयहासहा ।
ससरागिरिहारीहानोदेवालयकेटता ॥ २१॥

भारमाकुदशाकेनाशराधीकुहकेनहा ।
चारुधीवनपालोक्या वैदेहीमहिताहृता ॥ २२॥

विलोमम्:
ताहृताहिमहीदेव्यैक्यालोपानवधीरुचा ।
हानकेहकुधीराशानाकेशादकुमारभाः ॥ २२॥

हारितोयदभोरामावियोगेनघवायुजः ।
तंरुमामहितोपेतामोदोसारज्ञरामयः ॥ २३॥

विलोमम्:
योमराज्ञरसादोमोतापेतोहिममारुतम् ।
जोयुवाघनगेयोविमाराभोदयतोरिहा ॥ २३॥

भानुभानुतभावामासदामोदपरोहतं ।
तंहतामरसाभक्षोतिराताकृतवासविम् ॥ २४॥

विलोमम्:
विंसवातकृतारातिक्षोभासारमताहतं ।
तं हरोपदमोदासमावाभातनुभानुभाः ॥ २४॥

हंसजारुद्धबलजापरोदारसुभाजिनि ।
राजिरावणरक्षोरविघातायरमारयम् ॥ २५॥

विलोमम्:
यं रमारयताघाविरक्षोरणवराजिरा ।
निजभासुरदारोपजालबद्धरुजासहम् ॥ २५॥

सागरातिगमाभातिनाकेशोसुरमासहः ।
तंसमारुतजंगोप्ताभादासाद्यगतोगजम् ॥ २६॥

विलोमम्:
जंगतोगद्यसादाभाप्तागोजंतरुमासतं ।
हस्समारसुशोकेनातिभामागतिरागसा ॥ २६॥

वीरवानरसेनस्य त्राताभादवता हि सः ।
तोयधावरिगोयादस्ययतोनवसेतुना ॥ २७॥

विलोमम्
नातुसेवनतोयस्यदयागोरिवधायतः ।
सहितावदभातात्रास्यनसेरनवारवी ॥ २७॥

हारिसाहसलंकेनासुभेदीमहितोहिसः ।
चारुभूतनुजोरामोरमाराधयदार्तिहा ॥ २८॥

विलोमम्
हार्तिदायधरामारमोराजोनुतभूरुचा ।
सहितोहिमदीभेसुनाकेलंसहसारिहा ॥ २८॥

नालिकेरसुभाकारागारासौसुरसापिका ।
रावणारिक्षमेरापूराभेजे हि ननामुना ॥ २९॥

विलोमम्:
नामुनानहिजेभेरापूरामेक्षरिणावरा ।
कापिसारसुसौरागाराकाभासुरकेलिना ॥ २९॥

साग्र्यतामरसागारामक्षामाघनभारगौः ॥
निजदेपरजित्यास श्रीरामे सुगराजभा ॥ ३०॥

विलोमम्:
भाजरागसुमेराश्रीसत्याजिरपदेजनि ।स
गौरभानघमाक्षामरागासारमताग्र्यसा ॥ ३०॥

॥ इति श्रीवेङ्कटाध्वरि कृतं श्री ।।

कृपया अपना थोड़ा सा कीमती वक्त निकाले और उपरोक्त श्लोको को गौर से अवलोकन करें कि यह दुनिया में कहीं भी ऐसा न पाया जाने वाला ग्रंथ है ।

डीएल-आरसी नहीं दिखाने पर तत्काल #चालान नहीं काट सकती ट्रैफिक पुलिस: #सुप्रीम_कोर्ट

सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स के नियम 139 में प्रावधान किया गया है कि वाहन चालक को दस्तावेजों को पेश करने के लिए 15 दिन का समय दिया जाएगा. ट्रैफिक पुलिस तत्काल उसका चालान नहीं काट सकती है.

डीएल-आरसी नहीं दिखाने पर तत्काल चालान नहीं काट सकती ट्रैफिक पुलिस, ये है कानून ।

नया मोटर व्हीकल एक्ट लागू होने के बाद से वाहन का रजिस्ट्रेशन सर्टीफिकेट (आरसी), इंश्योरेंस सर्टीफिकेट, पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल सर्टिफिकेट, ड्राइविंग लाइसेंस और परमिट सर्टिफिकेट तत्काल नहीं दिखाने पर ताबड़तोड़ चालान करने की खबरें आ रही हैं. हालांकि सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स के मुताबिक अगर आप ट्रैफिक पुलिस को मांगने पर फौरन रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (आरसी), इंश्योरेंस सर्टिफिकेट, पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल सर्टिफिकेट, ड्राइविंग लाइसेंस (डीएल) और परमिट सर्टिफिकेट नहीं दिखाते हैं, तो यह जुर्म नहीं है

सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स के नियम 139 में प्रावधान किया गया है कि वाहन चालक को दस्तावेजों को पेश करने के लिए 15 दिन का समय दिया जाएगा. ट्रैफिक पुलिस तत्काल उसका चालान नहीं काट सकती है. इसका मतलब यह हुआ कि अगर चालक 15 दिन के अंदर इन दस्तावेजों को दिखाने का दावा करता है, तो ट्रैफिक पुलिस या आरटीओ अधिकारी वाहन का चालान नहीं काटेंगे. इसके बाद चालक को 15 दिन के अंदर इन दस्तावेजों को संबंधित ट्रैफिक पुलिस या अधिकारी को दिखाना होगा
मोटर व्हीकल एक्ट 2019 की धारा 158 के तहत एक्सीडेंट होने या किसी विशेष मामलों में इन दस्तावेजों को दिखाने का समय 7 दिन का होता है. इसके बावजूद यदि ट्रैफिक पुलिस आरसी, डीएल, इंश्योरेंस सर्टीफिकेट, पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल सर्टिफिकेट, ड्राइविंग लाइसेंस और परमिट सर्टिफिकेट तत्काल नहीं दिखाने पर चालान काटती है, तो चालक के पास कोर्ट में इसको खारिज कराने का विकल्प रहता है.

अगर ट्रैफिक पुलिस गैर कानूनी तरीके चालान काटती है, तो इसका मतलब यह कतई नहीं होता है कि चालक को चालान भरना ही पड़ेगा. ट्रैफिक पुलिस का चालान कोई कोर्ट का आदेश नहीं हैं. इसको कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. अगर कोर्ट को लगता है कि चालक के पास सभी दस्तावेज हैं और उसको इन दस्तावेजों को पेश करने के लिए 15 दिन का समय नहीं दिया गया, तो वह जुर्माना माफ कर सकता है.

चालान में एक विटनेस के साइन होना भी जरूरी है. कोर्ट में मामले के समरी ट्रायल के दौरान ट्रैफिक पुलिस को विटनेस पेश करना होता है. अगर पुलिस विटनेस पेश नहीं कर पाती है, तो कोर्ट चालान माफ कर सकती है।
वैसे भी देखा गया है कि ज्यादातर मामलों में पुलिस विटनेस पेश नहीं कर पाती है और इसका फायदा चालक को मिल जाता है ।

अधिवक्ता राजीव यादव
दिल्ली उच्च न्यायालय नई दिल्ली

आप भी जानिए बदले गए नए ट्रैफिक से जुड़े 11 नियम

सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सरकार ने मोटर व्हीकल बिल 2019 संशोधन किए है नए नियम निम्नलिखित हैं ।

1. नाबालिग को वाहन देना: नए कानून में नाबालिग वाहन चलाता पाया गया ताे वाहन मालिक काे दोषी माना जाएगा. वाहन मालिक को 25 हजार रुपए का जुर्माना और तीन साल की सजा होगी और नाबालिग को 25 साल की उम्र होने तक लाइसेंस नहीं मिलेगा. वाहन का रजिस्ट्रेशन रद्द होगा. नाबालिग के खिलाफ किशोर न्याय एक्ट 2000 के तहत मुकदमा चलेगा. बिल में 4 साल से अधिक उम्र के बच्चे काे भी अब हेलमेट लगाना हाेगा. नए बिल में ड्राइविंग की बाकी गलतियों में जुर्माना पहले के मुकाबले 5 से 30 गुना तक बढ़ा दिया गया है. दुपहिया वाहनों में ओवरलोडिंग करने पर अब 100 रुपए की जगह 3 हजार रुपए फाइन देना हाेगा

2. ड्रंकन ड्राइविंग: अभी दो हजार और नए एक्ट में दस हजार रूपये तक का जुर्माना किया जा सकता है.जेल की सज़ा का भी प्रावधान.

3. हिट एंड रन: ऐसे केस में यदि पीड़ित घायल है तो आरोपी वाहन चालक पर 12500 और पीड़ित की मौत होने पर 25 हजार रुपये का जुर्माना होता है.नए एक्ट में क्रमशः यह राशि पचास हजार और दो लाख रुपये रखी गई है. साल 2018 में हिट एंड रन के करीब 55 हजार मामले सामने आए थे, जिनमें 22 हजार से अधिक लोगों की जान चली गई है.

4. सीट बेल्ट: अभी सौ रुपये, नए एक्ट में एक हजार.

5. हेलमेट: अभी सौ रुपये और नए एक्ट में एक हजार.

6. रेसिंग करने पर: अभी पांच सौ रुपये और नए एक्ट में पांच हजार.

7. बिना इंश्योरेंश: मौजूदा एक्ट में एक हजार रुपये नए एक्ट में दो हजार.
8. ओवर स्पीड: अभी चार सौ रुपये और नए एक्ट में दो से चार हजार रुपये प्रस्तावित किया गया है.

9. खतरनाक ड्राइविंग: अभी एक हजार और नए एक्ट में पांच हजार रुपये.

10. बिना डीएल: अभी पांच सौ रुपये और नए एक्ट में पांच हजार.

11. अयोग्य ठहराने के बाद भी ड्राइविंग करते पकड़े गए तो दस हजार रुपये का चालान होगा, जबकि अभी यह राशि पांच सौ रुपये है.

12. वाहन की गलत बनावट: अभी ऐसा कोई प्रावधान है ही नहीं कि वाहन की गलत बनावट के चलते हादसा हो जाए और संबंधित कंपनी पर जुर्माना हो.नए एक्ट में यह प्रावधान शामिल है.यदि सुरक्षा के मापदंड पूरे नहीं होते हैं तो डीलर पर एक लाख और निर्मामा पर सौ करोड़ रुपये तक का जुर्माना हो सकता है.

भारतीय संविधान के कुछ महत्वपूर्ण अनुच्छेद

भारत, संसदीय प्रणाली की सरकार वाला एक प्रभुसत्तासम्पन्न, समाजवादी धर्मनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है. यह गणराज्य भारत के संविधान के अनुसार शासित है. भारत का संविधान संविधान सभा द्वारा 26 नवम्बर 1949 को पारित हुआ तथा 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ.भारत का संविधान दुनिया का सबसे बडा लिखित संविधान है. इसमें अब 450 अनुच्छेद, तथा 12 अनुसूचियां हैं और ये 22 भागों में विभाजित है. इनमें से कुछ महत्वपूर्ण अनुच्छेद निम्नलिखित है:
1. अनुच्छेद 1 : यह घोषणा करता है कि भारत राज्यों का संघ है.
2. अनुच्छेद 3: संसद विधि द्वारा नए राज्य बना सकती है तथा पहले से अवस्थित राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं एवं नामों में परिवर्तन कर सकती है.

3. अनुच्छेद 5: संविधान के प्रारंभ होने के, समय भारत में रहने वाले वे सभी व्यक्ति यहां के नागरिक होंगे, जिनका जन्म भारत में हुआ हो, जिनके पिता या माता भारत के नागरिक हों या संविधान के प्रारंभ के समय से भारत में रह रहे हों.
4. अनुच्छेद 53: संघ की कार्यपालिका संबंधी शक्ति राष्ट्रपति में निहित रहेगी.
5. अनुच्छेद 64: उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पढ़ें अध्यक्ष होगा.
6. अनुच्छेद 74: एक मंत्रिपरिषद होगी, जिसके शीर्ष पर प्रधानमंत्री रहेगा, जिसकी सहायता एवं सुझाव के आधार पर राष्ट्रपति अपने कार्य संपन्न करेगा. राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद के लिए किसी सलाह के पुनर्विचार को आवश्यक समझ सकता है, पर पुनर्विचार के पश्चात दी गई सलाह के अनुसार वह कार्य करेगा. इससे संबंधित किसी विवाद की परीक्षा किसी न्यायालय में नहीं की जाएगी.
7. अनुच्छेद 76: राष्ट्रपति द्वारा महान्यायवादी की नियुक्ति की जाएगी.
8. अनुच्छेद 78: प्रधानमंत्री का यह कर्तव्य होगा कि वह देश के प्रशासनिक एवं विधायी मामलों तथा मंत्रिपरिषद के निर्णयों के संबंध में राष्ट्रपति को सूचना दे, यदि राष्ट्रपति इस प्रकार की सूचना प्राप्त करना आवश्यक समझे.
9. अनुच्छेद 86: इसके अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा संसद को संबोधित करने तथा संदेश भेजने के अधिकार का उल्लेख है.
10. अनुच्छेद 108: यदि किसी विधेयक के संबंध में दोनों सदनों में गतिरोध उत्पन्न हो गया हो तो संयुक्त अधिवेशन का प्रावधान है.
11. अनुच्छेद 110: धन विधेयक को इसमें परिभाषित किया गया है.
12. अनुच्छेद 111: संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है. राष्ट्रपति उस विधेयक को सम्मति प्रदान कर सकता है या अस्वीकृत कर सकता है. वह सन्देश के साथ या बिना संदेश के संसद को उस पर पुनर्विचार के लिए भेज सकता है, पर यदि दोबारा विधेयक को संसद द्वारा राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है तो वह इसे अस्वीकृत नहीं करेगा.
13. अनुच्छेद 112: प्रत्येक वित्तीय वर्ष हेतु राष्ट्रपति द्वारा संसद के समक्ष बजट पेश किया जाएगा.
14. अनुच्छेद 123: संसद के अवकाश (सत्र नहीं चलने की स्थिति) में राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का अधिकार.
15. अनुच्छेद 124: इसके अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के गठन का वर्णन है.
16. अनुच्छेद 129: सर्वोच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय है.
17. अनुच्छेद 148: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी.
18. अनुच्छेद 163: राज्यपाल के कार्यों में सहायता एवं सुझाव देने के लिए राज्यों में एक मंत्रिपरिषद एवं इसके शीर्ष पर मुख्यमंत्री होगा, पर राज्यपाल के स्वविवेक संबंधी कार्यों में वह मंत्रिपरिषद के सुझाव लेने के लिए बाध्य नहीं होगा.
19. अनुच्छेद 169: राज्यों में विधान परिषदों की रचना या उनकी समाप्ति विधान सभा द्वारा बहुमत से पारित प्रस्ताव तथा संसद द्वारा इसकी स्वीकृति से संभव है.
20. अनुच्छेद 200: राज्यों की विधायिका द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा. वह इस पर अपनी सम्मति दे सकता है या इसे अस्वीकृत कर सकता है. वह इस विधेयक को संदेश के साथ या बिना संदेश के पुनर्विचार हेतु विधायिका को वापस भेज सकता है, पर पुनर्विचार के बाद दोबारा विधेयक आ जाने पर वह इसे अस्वीकृत नहीं कर सकता. इसके अतिरिक्त वह विधेयक को राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भी भेज सकता है.
21. अनुच्छेद 213: राज्य विधायिका के सत्र में नहीं रहने पर राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है.
22. अनुच्छेद 214: सभी राज्यों के लिए उच्च न्यायालय की व्यवस्था होगी.
23. अनुच्छेद 226: मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्च न्यायालय को लेख जारी करने की शक्तियां.
24. अनुच्छेद 233: जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाएगी.
25. अनुच्छेद 235: उच्च न्यायालय का नियंत्रण अधीनस्थ न्यायलयों पर रहेगा.
26. अनुच्छेद 239: केंद्र शासित प्रदेशों का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा होगा। वह यदि उचित समझे तो बगल के किसी राज्य के राज्यपाल को इसके प्रशासन का दायित्व सौंप सकता है या प्रशासन की नियुक्ति कर सकता है.
27. अनुच्छेद 245: संसद संपूर्ण देश या इसके किसी हिस्से के लिए तथा राज्य विधानपालिका अपने राज्य या इसके किसी हिस्से के ले कानून बना सकता है.
28. अनुच्छेद 248: विधि निर्माण संबंधी अवशिष्ट शक्तियां संसद में निहित हैं.
29. अनुच्छेद 249: राज्य सभा विशेष बहुमत द्वारा राज्य सूची के किसी विषय पर लोक सभा को एक वर्ष के लिए कानून बनाने के लिए अधिकृत कर सकती है, यदि वह इसे राष्ट्रहित में आवश्यक समझे.
29. अनुच्छेद 262: अंतरराज्यीय नदियां या नदी घाटियों के जल के वितरण एवं नियंत्रण से संबंधित विवादों के लिए संसद द्वारा निर्णय कर सकती है.
30. अनुच्छेद 263: केंद्र राज्य संबंधों में विवादों का समाधान करने एवं परस्पर सहयोग के क्षेत्रों के विकास के उद्देश्य राष्ट्रपति एक अंतरराज्यीय परिषद की स्थापना कर सकता है.
31. अनुच्छेद 266: भारत की संचित निधि, जिसमें सरकार की सभी मौद्रिक अविष्टियां एकत्र रहेंगी, विधि समस्त प्रक्रिया के बिना इससे कोई भी राशि नहीं निकली जा सकती है.
32. अनुच्छेद 267: संसद विधि द्वारा एक आकस्मिक निधि स्थापित कर सकती है, जिसमें अकस्मात उत्पन्न परिस्थितियां के लिए राशि एकत्र की जाएगी.
33. अनुच्छेद 275: केंद्र द्वारा राज्यों को सहायक अनुदान दिए जाने का प्रावधान.
34. अनुच्छेद 280: राष्ट्रपति हर पांचवें वर्ष एक वित्त आयोग की स्थापना करेगा, जिसमें अध्यक्ष के अतिरिक्त चार अन्य सदस्य होंगें तथा जो राष्ट्रपति के पास केंद्र एवं राज्यों के बीच करों के वितरण के संबंध में अनुशंषा करेगा.
35. अनुच्छेद 300 क: राज्य किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं करेगा. पहले यह प्रावधान मूल अधिकारों के अंतर्गत था, पर संविधान के 44 वें संशोधन, 1978 द्वारा इसे अनुच्छेद 300 (क) में एक सामान्य वैधानिक (क़ानूनी) अधिकार के रूप में अवस्थित किया गया.
36. अनुच्छेद 312: राज्य सभा विशेष बहुमत द्वारा नई अखिल भारतीय सेवाओं की स्थापना की अनुशंसा कर सकती है.
37. अनुच्छेद 315: संघ एवं राज्यों के लिए एक लोक सेवा आयोग की स्थापना की जाएगी.
38. अनुच्छेद 324: चुनावों के पर्यवेक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण संबंधी समस्त शक्तियां चुनाव आयोग में निहित रहेंगी.
39. अनुच्छेद 326: लोक सभा तथा विधान सभाओं में चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होगा.
40. अनुच्छेद 331: आंग्ल भारतीय समुदाय के लोगों का राष्ट्रपति द्वारा लोक सभा में मनोनयन संभव है, यदि वह समझे की उनका उचित प्रतिनिधित्व नहीं है.
41. अनुच्छेद 332: अनुसूचित जाति एवं जनजातियों का विधानसभाओं में आरक्षण का प्रावधान.
42. अनुच्छेद 333: आंग्ल भारतीय समुदाय के लोगों का विधान सभाओं में मनोनयन.
43. अनुच्छेद 335: अनुसूचित जातियों, जनजातियों एवं पिछड़े वर्गों के लिए विभिन्न सेवाओं में पदों पर आरक्षण का प्रावधान.
44. अनुच्छेद 343: संघ की आधिकारिक भाषा देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी होगी.
45. अनुच्छेद 347: यदि किसी राज्य में पर्याप्त संख्या में लोग किसी भाषा को बोलते हों और उनकी आकांक्षा हो कि उनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा को मान्यता दी जाए तो इसकी अनुमति राष्ट्रपति दे सकता है.
46. अनुच्छेद 351: यह संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार एवं उत्थान करे ताकि वह भारत की मिश्रित संस्कृति के सभी अंगों के लिए अभिव्यक्ति का माध्यम बने.
47. अनुच्छेद 352: राष्ट्रपति द्वारा आपात स्थिति की घोषणा, यदि वह समझता हो कि भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा युद्ध, बाह्य आक्रमण या सैन्य विद्रोह के फलस्वरूप खतरे में है.
48. अनुच्छेद 356: यदि किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को यह रिपोर्ट दी जाए कि उस राज्य में सवैंधानिक तंत्र असफल हो गया है तो वहां राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है।